मेरी कोरी कल्पना

मेरी कोरी कल्पना

मेरी कोरी कल्पना
स्वेत पृष्ठो पर भिखेर रहा हूँ
इस पूर्णमासी के नभतल
आत्म कण- मन कुरेद रहा हूँ ।

मेरी कोरी कल्पना
स्वेत पृष्ठो पर भिखेर रहा हूँ ,
पुर्णिमा के शीतल प्रकाश में भींगकर
प्रेमरस को तरस रहा हूँ ,
वेदनाओं के चंचल प्रकोप में
प्यासा मैं …
मन धन घन मन से बरस रहा हूँ ..

मेरी कोरी कल्पना
स्वेत पृष्ठो पर भिखेर रहा हूँ

कल्पनाओं के सागर तल बैठा मै
अपनी काया को सीमेट रहा हूँ
स्वेत काव्य लताओं में उलझी ….
घड़ियों में स्वयं को बिखेर रहा हूँ ,

सुनेगी ईश क्या तेरी
क्या ? मेरी कोरी कल्पना ?

मेरी कोरी कल्पना …
जिसे आज मैं स्वेत पृष्ठो पर भिखेर रहा हूँ ।

-अतुल शुक्ला

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बे गौर

मुक़ाबले थे कई ,

कोशिशें थी कभी,

हर तरफ ख़यालो में जरूरते थी भरी,

मंजिले भी करीब थी इतनी

था सब कुछ हकीकत

लेकिन

न थी कभी समझदारी

सब कुछ हुआ था नही जो

जो समझ पाया मैं अबतक कि-

न समझियों ने मेरी बदला लिया जब मुझसे

जिंदगी मुझे तभी समझ आयी ।

ग़फ़लत

जिंदगी भर मैं भागता रहा इतना ,

गुंजाइशों में गुंजाइश रहा जितना ,

जो छोंड़ आया मै जिंदगी किसी मोड़ पर

आज ढूंढ कर भी हिसाब कहाँ मिलेगा उतना ?

♠️

मुस्कुराहटें और ख़ुशबू थी जो लगती छोटी,

वक़्त की करवट में आवाज़ कहाँ है होती ?

फिर जितना भी उड़ा मैं उचाईयों पर ,

लेकिन जब मोम के पंखों से गिरा मैं तो पूछता हूँ !

♣️

क्या वो वक़्त सही था , या मैं ग़लत

जो भी है लेकिन फिर कभी कोई उड़ पाता है उतना ?

Subsidiary Risks

Subsidiary Risks

I call off my course ,

When I saw sea roars,

Trembling clouds at shore

Laying palm on sea roads

I decided to make fast at shore

Yes it’s dangerous but I call it Subsidiary Risk !

Risk against the fate

Crawling dead late

Making no calls

Without shine and shade

Dreaming for safe roads and mirror waves

Inspite of stranding

I choosen to look at dock gates

Because I was not knowing

How long I should wait ?

I can’t found my mates

Among crowd of evil traits

When I surrendered to the destiny

And deprived of my sea heart rates

Waiting for the waves to pitch moderate

To go back to the seas

But for now

Calling off my course

Fasting to shores

Choosen to half life

Despite caring about the systems

And unknown subsidiary Risks.

न गली गली में शोर है

न गली , न चौपलो में
न सूखे खेतों में , भूखे गलियारों में
न मैली गंगा यमुना तट पर ,
न मस्ज़िद की अजानों में ,मंदिर की संख नादों में ,
न मौलवी की हिदायतों में , न पण्डितो की वाणियों में
न बेरोजगारों की डिग्रीयों में ,
न कब्रिस्तानों में, न शमशानों में ,
न भंडारों में , न मयखानों में
न कश्मीर में ,न कन्याकुमारी में ,
न काशी में , न अजमेर में ,
न भगवा में ,न हरीयाली में ,
न केशव में , न मुहम्मद में ,
न रासलीलाओं में ,न ताण्डव में ।
न राष्ट्रभक्ति में , न प्रेमशक्ति में
न सैतालिस में , न चौराशी में
न गोधरा में , न शामली में ।

न शोर है , न कोई और है ,
जानकर भी अनजान हूँ मैं
इसलिये
हर घोटालों में भी शामिल हूँ मैं !
क्योंकि मालूम है मेरा वोट खोटा
और जितने वाला नेता चोर है ,
कोई पप्पू , कोई फेकू
कोई बहनजी तो कोई टोटी चोर है !
फिर भी छाया है सन्नाटा
न शोर है , न कोई और है

परिषद से मंत्रालय तक
पांचों से अदालत तक
परेशानियो को सुनता कौन है ?
अगर ईश्वर मूर्ति ,अदृश्य है
तो काबिल ,जिंदा ,जगरूप देश क्यों मौन है ?

मेरा नेता भी चोर है, तेरा नेता भी चोर है ।
जो जीतकर आएगा , जो लाल बत्ती लगाएगा
चोर है , चोर है ।
1947 से 2019 बस इसी का शोर है
कोई कम , कोई ज्यादा लेकिन
वोट में ही है खोट है !

प्रत्याशी सही हो , तभी वोट हो
नही तो NOTA पर ही चोट हो !!!

~अतुल भारत

#Elections2019

मैं भी चौकिदार हूँ

मैं भी चौकिदार हूँ (भाग १)

हाँ जी मैं भी चौकीदार हूँ ,
बीटेक और mba डिग्री के बाद भी बेरोजगार हूँ ,
राहुल और तेजस्वी से ज्यादा समझदार हूँ ,
रास्तों में ढूंढता नौकरी का इश्तहार हूँ मैं ,
हा तुममे से ही एक बेरोजगार हूँ !

अपने घर का होनहार हूँ !
पप्पू के न्युक्तम वेतन योजना का हकदार हूँ !
आडवाणी और जोशी जैसा लाचार हूँ ,
माया और अखिलेश जैसे सत्ता को बेकरार हूँ !

चलान के बदले 50 रु का नोट देने वाला इंसान हूँ मैं ,
आरक्षण न मिलने वाला बेकार हूँ,
सच बोलता हूँ मैं भी चौकीदार हूँ !

न भक्त हूँ , न गुलाम हूँ
न आम आदमी सा ठुल्ला
न नेताओं से नल्ला
लेकिन फिर भी
चौकीदार हूँ
चौकीदार हूँ मैं । – अतुल भारत

#MainBhiChowkidar

पथिक

जब अमावस के घनी बेला में
धरती गलियारी धूल की चादर ओढ़े
अंधियारे का आंचल दमके
पथ में छितरी अंगारी
से राह दिखे हल्के धमके
तो आह भूल , दे सांसों को तूल
लौ लिपिट ताल में ताल से मिला,
कदम मिला नई रह बना !!

ना सुन वेगो की वीर अनल,
पथ में सिमिटी तू तेज बना
मै अनिल सा कोपल निरन्तर हूंगा
तुझपर , तू कदमताल को मीत बना,
जब पथ में छितरी अंगारी
से राह दिखे हल्के धमके
तो मंजिल को तो मेरे गीत सुना !

जब राह में सब साथ नहीं ,
धरती , अम्बर और सृष्टि शंकर साथ नहीं,
तब तक तू मिट्टी काया तू साथ बना
धूल की चादर ओढ़े काल को कपाल बना
लिखकर पौरुष को तू जान बना
थमकर नक्षत्र को साक्ष्य बना
मेरी टूटी सांसों के तख से
पथ पाषाण में राह बना
पथ भ्रामिक पुरुष की दाधीच कला से
ले इन्द्र सा विजयी भाल बना !

पथ में बिखरी अंगारों
से राह दिखे हल्के धमके
तो आह भूल , दे सांसों को तूल
लौ लीपिट कदम को तेज बढ़ा,
जब साथ नहीं कौरव ऋतुवे,
तो स्वयं सांस बढ़ा ,
मंज़िल तक की राह बना !
जब राह दिखे हल्के धमके
तो मंजिल को तो पौरुष गीत सुना !

~अतुल

२०१९ का इंकलाब

२०१९ का इंकलाब

जब सूरज छाती खोलेगा,
चंदा भी हिंदी बोलेगा ,
तारो की गिनती भी होगी,
जब जब इंकलाब खौलेगा !

जब मातृभूमि की चरणो थामे,
अपना फिर प्रधान सेवक होगा,
तब बात रहेगी अजादी की ,
आत्म ध्वनि से वन्दे मातरम् होगा !

फिर कमल खिलेगा हाथो से,
साईकिल पर हाथी सा चलने वालो से
जब झाड़ू से बेहतर कोई पोछा होगा
होगी नव क्रांति जैसा बापू भगत ने सोचा होगा !

जब कश्मीर से कन्याकुमारी तक ,
ना जाति वाद और धर्म वाद की बातें होंगी ,
ना गोधरा , ना चौरासी की रातें होंगी !
जब अनपढ़ , बलात्कारियों से बेहतर नोटा होगा !
जब घोटा सिक्का घोटा होगा !

जब बच्चा बच्चा छाती खोलेगा,
तिरंगा भी गणतंत्र बोलेगा ;
वोटों से बदलाव मिलेगा ,
जब जब इंकलाब खौलेगा !
तिरंगा अपना रंग बोलेगा !

क्या ये अटल इरादा है,
नव भारत का वादा है !

अब आयी है इंकलाब की बारी करते है बातें जारी !….

#2019elections #GeneralAssembly
#Loksabha #VandeMatram #Inqlaab #Hindustan #Communist #HyperNationalism #BJP #Congress #SP #BSP #TMC #Democracy #Atal

पथिक

जब अमावस के घनी बेला में
धरती गलियारी धूल की चादर ओढ़े
अंधियारे का आंचल दमके
पथ में छितरी अंगारी
से राह दिखे हल्के धमके
तो आह भूल , दे सांसों को तूल
लौ लिपिट ताल में ताल से मिला,
कदम मिला नई रह बना !!

ना सुन वेगो की वीर अनल,
पथ में सिमिटी तू तेज बना
मै अनिल सा कोपल निरन्तर हूंगा
तुझपर , तू कदमताल को मीत बना,
जब पथ में छितरी अंगारी
से राह दिखे हल्के धमके
तो मंजिल को तो मेरे गीत सुना !

जब राह में सब साथ नहीं ,
धरती , अम्बर और सृष्टि शंकर साथ नहीं,
तब तक तू मिट्टी काया तू साथ बना
धूल की चादर ओढ़े काल को कपाल बना
लिखकर पौरुष को तू जान बना
थमकर नक्षत्र को साक्ष्य बना
मेरी टूटी सांसों के तख से
पथ पाषाण में राह बना
पथ भ्रामिक पुरुष की दाधीच कला से
ले इन्द्र सा विजयी भाल बना !

पथ में बिखरी अंगारों
से राह दिखे हल्के धमके
तो आह भूल , दे सांसों को तूल
लौ लीपिट कदम को तेज बढ़ा,
जब साथ नहीं कौरव ऋतुवे,
तो स्वयं सांस बढ़ा ,
मंज़िल तक की राह बना !
जब राह दिखे हल्के धमके
तो मंजिल को तो पौरुष गीत सुना !

~अतुल

बेजुबान जिदंगी

२०१९ की शुरुवात सच की बात से –

बेजुबान जिदंगी

शायद जुबा से ही फेल हूं मैं ,
अब तक लगता था कि जिदंगी का खेल हूं मैं,
फिर सामने एक जिंदा तस्वीर आ गाई ,
नंगी आंखों को खुद पर शर्म आ गयी,
बह कर कटने लगी यूं हकीकत से ये
शायद शिकायत की शिकायत से बात आगयी !
लगता था मुझको भी पहले –

जिंदगी से हजारों शिकायत हैं मगर
फिर जिदंगी की खुद की तस्वीर आगाई !
खामोशी में सिमटी तकलीफों की गर्मी ,
सर्दी में को भी बारिश का पता बता गई !

“यूं तो ये जिदंगी है हजारों शिकायत तुमसे मुझे….

मगर तेरी इस खूबसूरत बेबस तस्वीर ने मुझे खामोश कर दिया !!”

– अतुल

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Existence

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Existence

I was never told this before -that the darkness prevails,
Darkness visible in the depth of our sights,
Like,
Two parallel light rays meets somewer in infinite,
With no equation and no theory of convergence and divergence.

The Darkness becomes darkness visible,
as it is,what its like.
It doesn’t needs any media to propagate, vaccum reason to imitate,
Bare theory here simply sustains.

Thereby at some sort of time,
The darkness becomes darkness visible.
All confusions,regrets and Questions resolves
and mystery of light simply falls.

When you understand this untold fact,
And the reason,
Why you were never told this before-  that darkness exists.
Darkness is visible in the depth of our sights,
Runs parallel but meets at infinite.

All forms of ostentation are unendurable,
when its inexplicable and played kinematics,
Darkness becomes darkness and more visible.

– AtulShukla

#Morning #Dark #twilight #infinite #strike #rhymsayers #seaside #vision #introspection

Are we the same as Trees?

Are we the same as Trees?

Our lives are as forest;
Each Individuals as trees
Showing cobwebs of branches,
Their leaves and some dry barks.

.

Below the soils,
There is always chance to spread,
Spreading out are roots galore.
Branches to touch the sky
Turning up dry in that desire
Clouds, Sky & Star
Everything I saw, I dreamt is too far
With the time & the seasons
.

Wrinkled shadows turning dry

Never judge anyone,
By appearances alone,
You see not what we’ve atone.

.

Hidden from our sight,
Is where our soul lurks
And somewhere God’s grace works.
And I ask you..
Are we same as Trees?

#Tree #SpeakingTree #journeytoself #forestfeatures #poetryporn #question

ओशो – गलतियों पर सीख

#जितनी ज़्यादा ग़लतियां हो सकें उतनी ज़्यादा ग़लतियां करो. बस एक बात याद रखना: फिर से वही ग़लती मत करना. और देखना, तुम प्रगति कर रहे होगे.

पानी का आयना

हर गम्भीर शब्दों से कविता गम्भीर नहीं होती , सरल काव्य रस से पिरोयी हुई भाव को छूती और वक़्त की खोयी हुई मेरी एक कविता

कविता संख्या : अनजान

“पानी का आयना”

दिन की दोपहरी में थक जाने पर
जब पीपल की छांव में
छिपने की सोची,
तो चमचमाता चिल्लाता कोई
जान लो सच अपना अपना मुझमें !
चमचोर चाँदनी सा ,
भू धरा में भिखरा हुआ ,
पानी का आयना ।

सब कुछ दिखता है ,
जितना भी टिकता है ।
बोलता हैं …
सब कुछ ;
पानी का आयना !
ना जात पात की अंध्यारी ,
ना भाव भ्रम की किलकारी ,
ना दाम धर्म की तौल यहाँ !
खुला बिकता हैं ,
यौवन सच का –
जितना भी सींचो
दिखता हैं तत्पर त्वरित ‘
सब कुछ एक पलभर
बस देखो तो सही
आगे बड़कर
ये वही है भू धारा में बिखरा पड़ा ,
पानी का आयना ।

अगर जानना है ख़ुद कि क़ीमत ,
तो देखलो पानी का आयना ।

पहचानना हैं
ख़ुद को ,
की कितना है ?
तो देखो कभी आगे बड़कर ,
पानी का आयना ।

~ अतुल शुक्ला

खुरदरा झूँठ

खुरदरा झूँठ,

झूठी महिमा,

झूठा सच,

झूठा तप,

झूठा पखांड का अवतार तेरा ,

सब कुछ झूठा इतना की –

अब टूटा ईश्वर पर विश्वास मेरा !

.

बिकाऊ इज़्ज़त ,

बिकाऊ आस्था ,

मन का दाम ,

बढ़ता रहा निरंतर ,

ईश्वर का व्यापार तेरा ,

अहंकार में लिपटी तेरी धोती

ईश्वर से ना डर कर

ख़ुद बन ईश्वर –

चलता रहा एक धागे का व्यापार तेरा !

.

खुरदरा झूँठ

झूठा वचन

झूँठ में लिपटा संसार तेरा

तू भ्रम पर जीवित

तू भ्रम में सीमित

बेचता रहा अभिमान तेरा !

.

जीवन की मूल्य लगाकर

बनाता गया ईमान तेरा

कैसा है तू लाल धारा का

जब झूठा है सब सम्मान तेरा !

खुरदरा है लाल नाम का धार तेरा !!

.

एक कविता धोकेबाज – झूँठे बाबाओं और उनके गुंडे गर्दी करने वाले जनेवधारी खड़ाऊँ वाले भक्तों के नाम !

एक साल

एक साल बदल गया

जीवन राग असफल गया ,

क़दमों के निचो से ज़मीं धसकी

जब असमां में सिमटा रवि

कण कण दरबदर – रंगबदर गया !

.

टूट गयी आशा ,

बढ़ी शब्दों में जो निराशा

रिश्तों का बोझ लिए,

आत्म रस और आत्म प्रेरणा का रेशम धागा

विश्वास में लिपटा टूट गया !

जब जीवन का एक साल रूठ गया !

.

प्रेम , धर्म , मर्यादाओं का झूठा जाल ,

अहाँकार और क्रूरता का क़दम टाल

झूठ और मक्करी की विविधता में

अपनो को रौंध गया ,

सपनो को अंतिम घाट के तट पर

धारा की रेती में सौंध गया !

सत्य का एक साल बोल गया !!

.

ना कुछ शेष ,

ना शिथिल अवशेष ,

ना कोई भाव सीमा

ना अब कोई परिवेश

एक साल बीत गया !

नियति का खेल बीत गया !

कटु मधुर संगीत गया !

.

काल के पुकार में

जीवन मैं अदना सीख गया !

जब जीवन से परे

सब रीत गया !

…………………..-अतुल

बहरूपियाँ

प्रांचि की छितिर साँच,

अरुण की भिखिर राख,

नीरद की अट्टहास !

तिमिर से श्वेत काँच ,

चमचमती परछाईं झाँक ,

दिनकर की अनुपस्थिति में कलानिधि

आज बन बैठा है बहरूपियाँ !

.

प्रकट हुई जो भादव राग ,

छूट गया पीछे माघ का फाग ,

बोयी हुई सनसनाहट की सुलगती ,

कोटि कटु शांति की आँच ;

कुंठित ह्रदय ठिठरन जैसे

सबरंग पसरी पूस की रात !

और झींगुर की तरह –

टिमिरता में शांति कण को निगलता ,

स्याह चादर में छिपकर व्यंग करता ,

अपने में से कोई बहरूपियाँ !

.

छुपकर चुपकर घुलमिलकर बहरूपियाँ ,

प्रभुवचनो में लिपटी मिश्री सा ,

चंदन अर्क की चादर ओढ़ें

प्रेम प्रतीति हरे मिले

सदा करता गुरु गुण गान

मनुष्य जीवन की सत्यता से भिन्न

कोई राह में भटका हुआ

बना हुआ स्व -अत्यधिक अभिमानी महान !

.

क्या ईश्वर भी कठपुतली सा दिखता है .,

जब गिनती में अग्रपाँति में समर्पित है

बहरूपियाँ !

बहरूपियाँ !

पतन

स्व: से स्वयं का पतन,

जब टूटा मेरा अपनो से मन ,

अहंकार और झूठे बदरा की परछाईं छूटी ,

जहाँ सिमटा था मेरा अपना वतन !

.

.

सोचकर , समझकर हैरान हूँ मैं ख़ुद में .

जब मैंने देखा है –

अपनो द्वारा किए गए जतन

कुंचित सीमित नभ कण कण में ,

जैसे शरद में संघर्षित रवि का तपन !

कैसे निरंतर कर्मों में शीर्ष क्रमिक ही है ईश्वर

जब स्व: से स्वयं का ही है पतन ?

Are we Trees?

Are we the same as Trees?

.

Our lives are as forest;

Each Individuals as trees

Showing cobwebs of branches,

Their leaves and some dry barks.”

.

Below the soils,

There is always chance to spread,

Spreading out are roots galore.

Branches to touch the sky

Turning up dry in that desire

Clouds, Sky & Star

Everything I saw, I dreamt is too far

With the time & the seasons

.

Wrinkled shadows turning dry

Never judge anyone,

By appearances alone,

You see not what we’ve atone.

.

Hidden from our sight,

Is where our soul lurks

And somewhere God’s grace works.

And I ask you..

Are we same as Trees?

.

#Tree #SpeakingTree #journeytoself #forestfeatures #poetryporn #question

संशय

अविजयी जीवन से क्या पाऊँगा?
लेकिन जितना तो आता नहीं,
हारना दंभ को भाता नहीं !
नियति से लड़कर अब कहाँ जाऊँगा ?

मुश्किल है की जीवन है
शायद ख़ुद में नामुमकिन है
राह की विवशता में घिर गया हूँ
अलंघ्य नभतल से गिर गया हूँ
धूल के अँधियारें में
अपने मंदिर के गलियारें में
टूट कर भिखर गया हूँ मैं

नियति का खेल
फीके रंगो का मेल
और धुरी के दो आकर्षण
अनिर्णित
कब तक ?

अशांत मन को अब कैसे समझाऊँगा
जीवन हार का ही स्वरूप है
और चाह कर भी अनुरूप है !
माँग कर भी उतना मिलता नहीं
परिपक्वता से कुछ होता नहीं
सब नियति का खेल है !

लेकिन अब पथअंत के शिखर पर
इस रुस्ठ नियति से मैं क्या पाऊँगा ?

-AtulShukla

Illustration

Apart from manifestation and explanation

Sometimes I read life too…

And In Breaking winter morning what I found is…

I was never told before that darkness prevails,

Darkness visible in depth of our sights,

Like,

Two parallel light rays meets somwer in infinite,

With no convergence and no divergence.

.

Darkness becomes darkness visible,

as it is,what its like.

It doesn’t needs any media to propagate,

Bared theory to sustain.

.

Thereby some sort of time,

The darkness becomes darkness visible.

All confusions,regrets and Questions resolved,

and mystery of light simply falls.

.

When you understand this untold fact,

Why you were never told this before- that darkness exists.

Darkness is visible in depth of our sights,

Runs parallel but meets at infinite.

.

All forms of ostentation are unendurable,

when its inexplicable and played kinematics,

Darkness becomes darkness and more visible.

– AtulShukla

श्रद्धांजली : द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

हिंदी काव्य महासागर में फैले अनेको में से एक रत्न “द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी जी” को मेरा सत् सत् सह्रदय नमन !

बाल कविताओं के लिए विख्यात द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी का जन्म आज ही के दिन यानी 01 दिसंबर, 1916 को हुआ।

द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी : जिनकी कविताओं के सहारे हमने अपना बचपन सींचा

—————

द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी की कुछ कविताएँ आपको याद दिलाता हूँ :-

१: “उठो लाल अब आंखें खोलो…'”

२: “वीर तुम बढ़े चलो”

३: “हम सब सुमन एक उपवन के”

४: “हाथी-घोड़ा और पालकी ”

५:

‘लाठी लेकर भालू आया

छम-छम-छम

ढोल बजाकर मेंढक आया

ढम-ढम-ढम

मेंढक ने ली मीठी तान

और गधे ने गाया गान’

६:

उठो धरा के अमर सपूतो

पुनः नया निर्माण करो।

जन-जन के जीवन में फिर से

नई स्फूर्ति, नव प्राण भरो ”

७:

“वीर तुम बढ़े चलो! धीर तुम बढ़े चलो!

हाथ में ध्वजा रहे बाल दल सजा रहे

ध्वज कभी झुके नहीं दल कभी रुके नहीं

वीर तुम बढ़े चलो! धीर तुम बढ़े चलो!”

29 अगस्त 1998 को द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी ने हमें सदा के लिए अलविदा कह दिया, लेकिन वह आज भी उनकी कविताएँ हमारे जीवन में स्थान बनाये हुए है !

#DwarikaPrasadMaheshwari

#birth_anniversary

#KoriKalpana

#कवितायें

हार का उपहास

हार का उपहास

सत्य का निर्वासन ,
बुद्धि का शव आसन ,
स्वर तुच्छता का प्रकाशन ,
राम नाम के काग़ज़ में लिपटा
प्रतंत्रता का कोरा स्व: शासन !

सहज सरल समझो जैसे
हार का उपहास,
नियति पर प्रकाश,
प्रेम की मिरिचका
सिमटी भिखारी काया पर-
भिक्षु का कटु रास ,
क्रोध का विकाश ,
ईश्वर का विनाश ,
स्वाँग का परिहास ,
पुरुसार्थ की अंतिम साँस ,
चरित्र मंथन की मूर्त पर
धुर्तता का महिमा मंडन अनायास !

छल कर छल छल ,
विनर्मता का झूठा प्रयास ,
वक़्त की चतुपरिता पर
खोए प्रभुता की आस ,
अनैतिक विजय पर
आज फिर
हार का उपहास

स्वयं पर !!

#आजकीकविता

-अतुल शुक्ला

70th Independence Day and Children Tragedy of Gorakhpur

गोरखपुर की वास्तविक घटना पर कवि की कल्पना –

आज़ादी दिवस पास है तो आज हिंदी में लिखूँगा क्यूँकि राष्ट्रवादी दिखने का ट्रेंड है !

चेतवानी – ये एक ग़ैर राजनीतिज्ञ व्यक्ति -जो कि" मैं ", द्वारा पढ़ी ,समझी,और सामान्य लोगों के भावनाओं को झकझोर देने वाली कुछ बातें हैं , इनका किसी धर्म , किसी राष्ट्र , किसी सरकार और किसी पीड़ित जनता से कोई सम्बंध नहीं है , अगर फिर भी कोई समानता मिलती है तो मात्र एक संयोग कहा जाएगा !

चाहता तो अपने facebook Page पर पहले पोस्ट करता और चार पाँच likes और comments का इंतज़ार करता , लेकिन आज मन हुआ की लिखूँ अपने ब्लॉग पर " अपने मन की बात "

और एक सवाल – नन्हें मुन्ने बच्चें तेरी मुट्ठी में क्या हैं ?
(आज़ादी के ७० वर्ष पर अधूरा जवाब – मुट्ठी में हैं तक़दीर हमारी , हमने क़िस्मत को बस में किया…)

History में हमेशा रुचि रही है और किताबों के आइनों से दुनियाँ अधिक देखी और समझीं ।

कहानी का भाग -१

और एक क़िस्सा द्वितीय विश्व युद्ध का जब मासूमों की रक्त धाराएँ अपने अपने राष्ट्र की विजयी पताकाओं के वेग को सींच रही थी । सर्वत्र फैले capitalism और colonism के प्रकाश बादलों ने अँधियारो से गलियों और मस्तिष्कों को भर दिया था ।
तारीख़ August 10,1944 फ़्रान्स , इटली , और लंदन के अख़बारों में एक अलग तरह के नरसंघार की ख़बर छपी ।
ख़बर थी
" हिट्लर कि नाज़ी सेना ने Jews बच्चों को Gas Chamber में ज़हरीली गैस देकर सुला दिया "
"मृत बच्चों की संख्या 800 से अधिक , ग़ायब 3600 से अधिक ।"
तारीख़ August 11 ,1944 जर्मनी में हिट्लर के प्रवक्ता ने कहा कि गम्भीर बीमारी से 30 बच्चों का निधन और chancellor Hitler इस ख़बर पर नज़र रख रहे है ।

पहली बार सुनी ऐसी ख़बर को किसी ने ध्यान नहीं दिया और कुछ महीनो में Jews Halocaust In Germany के बारे में पढ़ा -देखा-समझा !

—–

वक़्त बदल रहा है और हम राष्ट्रवादी लोग हिंदुस्तान के गणतंत्र में रहते है और १५ august को वन्दे मातरम गाकर , कुछ धूल भरी किताबों से निकाले गए नामो का संस्मरण करेंगे और देश की तरक़्क़ी और अर्थ व्यवस्था में सहयोग देंगे !

और ऐसा करना भी चाहिये !

कहानी का भाग – २

तारीख़ August 10,2017
स्थान : गोरखपुर का अस्पताल
घटना : 36 बच्चों की अस्पताल में oxygen गैस ख़त्म होने से मृत्यु
सरकार का जवाब – दिमाग़ी बुखार से मृत्यु , जाँच कमेटी जाँच करेगी
अस्पताल के डॉक्टर का जवाब – पैसों की कमी से Oxygen सप्लाई बंद की गयी जिससे मौत हुई

—–

कहानी का भाग ३

एक पूर्व राष्ट्रपति जो अल्पसंख्यक समाज से कभी हुआ करते थे , जिन्होंने अपनी सारी उम्र AC,Mercedes और सरकारी ऐशो आराम से काट दी और उन्हें अपने सरकारी जीवन के आख़िरी छड़ में याद आया की देश में अल्पसंख्यको की सुरक्षा में अभाव है !

—–

उपयोक्त तीन कहानियों के रंग तीन अलग अलग हैं –
केशरियाँ
सफ़ेद
हरा

और अपने अपने शब्दों में , राज्यों, भाषाओं की परतंत्रता में संगठित होते हुएँ , दुनियाँ के सबसे तेज़ बढ़ती जनसंख्या वाले देश के सभी काल्पनिक पात्रों से जिनका वास्तविकता से कोई रिश्ता नहीं हैं , उन सभी को

आज़ादी के ७० वे वर्ष की शुभकामनायें !

वन्दे मातरम 🇮🇳

जय हिंद 🇮🇳

– अतुल शुक्ला

आख़िरी सलाम 

आख़िरी सलाम

*
फिर साँसो की
धार टूट गयी ,
चूड़ी सिंदूर की
आस फूट गयी !
अब तो जीवन रूठ गया है,
तिरंगे में लिपटकर गाँव छूट गया है !
ग़रीब माँ का सहारा
ठूँठ गया है !
*

दिया है भटके लोगों ने
भारत की पंखुडीयो को तोड़कर
थोपा है ख़ूनी लाल सलाम !

*
वोटों की राजनीति
और सरकारों की नीति
मक्करी और धोखेबाज़ी
और विद्वानो की मार्क्सवादी चोली
सबने मिलकर खेली है
मासूमों की ख़ून की होली
फिर भी
भारत माँ की चरणो में तत्पर
देता हूँ
अपनी आहुति का आख़िरी सलाम !
*

फिर साँस छूट गयी
शांति धार टूट गयी,
वामपंथीहथियारों की ताक़त से ,
स्वतंत्रता की नीव ठिठुर गयी
*

ये खेल ही है ऐसा
वो मौज करते रहे ,
और हम मरते रहे !
बेशर्म है मेरी आखें
अपनी झूठी द्यतिवक्ता को
गांधी की अहिंसा कहकर
आत्मधैर्य के साहस रच कर !
खेल खेल में मिलकर,
कायरों सा स्वाँग रचे !
बेशर्मी की चादर पहनकर
एक बार फिर ,
आओ निंदा करे !
*
अतुल शुक्ला
*

कुछ और मार दिए गए सुकमा छत्तीसगढ़ में !
पत्थर का जवाब ना दिया इसीलिए आज गोलियाँ मिल रही है !
आदिवसीयो पर अत्याचार की झूठी कहानियाँ बनाकर लोग अपने स्वार्थ के लिए , हथियार उठाते है ! मासूमों की हत्याकरते है ! और अगर सरकार कार्यवाही करे तो राजनेता इसे मानवअधिकार की अववेलना कहते है !
इसीलिए सभी दोहरी मानसिकता के लोगों से कहते है आइए के बार फिर…….

आइये मिलकर बेशर्मी से कड़ी निंदा करे !

#sukma #crpf
#NaxalAttack
#Communist #terror

दो किनारे


 

दो किनारे

 

इस अनजान नादिया के हम दो किनारे थे 

बीच में बहती ख़ामोशियों के इसारे थे 

कुछ तुम्हारे तो कुछ हमारे थे 

जो रंग ने बाट दी है हमारी तक़दीरें

गेंदो में लिपटे हम थे , 

और कुछ उन्मे गुलाब तुम्हारे थे 

सब कुछ वक़्त की ही बात थी 

जो आज अधूरी है वो बीती ख़्वाबों की रात थी  !

 

 

और जब

लहरों की लकीरें को झाँक कर देखता हूँ 

उनकी गहराइयों में भिख़री अकेलेपन में 

स्वयं के अंधकारो को भेदता हूँ 

तो बस लगता है 

आज भी 

हम कभी अनजान नादिया के हम दो किनारे हैं !

कुछ भिखरे ,कुछ सिमटे 

भीगे रेती में अपने अपनो के सहारे हैं  !

 

अतुल शुक्ल 

मेरे सामने की दिवार

वो खुद को भूलकर खड़ी है

सप्तरंग रितुवो में ठूठी पड़ी सी पड़ी है

फिखे रंगों की चादर ओढे हुए

भिखरते दरारों से भरी हुई है

नाखुश रहने की

शायद उसकी आदत सी बनी है

मेरे सामने की दिवार

खुदको भूलकर खड़ी है

 

अनजान है वो अपनी ऊँचाइयों से

भूतल में भिखरी रेत में तपती

उसकी साँसे पड़ी है

अनजान हूँ मै उसके

रग रग में बसे उमंगो से

लेकिन

मेरे अन्दर की चाहत

उसके छोटे टूटे कोने की ईट में

उसके खोये हुए हिम्मत भरने की है

मेरे सामने की दिवार

कल से खामोश खड़ी है

मेरे सामने की दीवार 

जब कभी देखता हूँ 

लगता हैं यूँ ही ….

– अतुल शुक्ल

#9 शायद वो तुम थी

शायद वो तुम थी ।।

🙂

जब रात निहार रही थी

करुणाप्रेम सागर पर किरणे

स्वपन मार्ग में चुपके कदमो से

हुई मधुर कोलाहल तेरे कदमो की . ..

🙂

प्रथम घटा की आहट ने

बतलाया मुझको

शायद

वो तुम थी जिसको सोचा था मैंने ।

🙂

उस शाम को जब निहार रहा हूँ मैं

टूटती किरणे बिखरी सागर पर

मिश्रित तरंग जल कण कण में

🙂

मेरे नयनो के प्रकाश आँचल को

मोहित मुग्द करती

छूकर मेरे मन को

🙂

शायद वो तुम थी

जिसको सोचा था मैंने

पूर्णिमा के स्वेत अम्बर में

जब चन्द्रकिरण भिखरी थी

अनंत प्रेम नव नभ् मंडल में

और ह्रदय गति भी माध्यम थी

🙂

सोचकर जैसे

स्पर्श मीन कोमल हाथो का

शायद वो तुम थी

🙂

जिसको निहार रहा था

अपने स्वप्न जीवन में

घड़ियों के चक्रों में

पल पल के उपवन में

जहा भी था अशांत मन चितवन

🙂

क्रंदन क्रीड़ा ह्रदय की थी जब भी

जैसे भी कही भी

शायद वो तुम थी

जिसको सोचा था मैंने ।।

🙂

लेकिन स्वपन काल के आँगन में

था जो आँचल प्रेम गगन का

सिमटा था खुद में

शर्म की अपनी कुंठा से …

स्वप्न में थी जो भी तुम

शायद वो तुम हो जिसको सोचा था मैंने

शायद वो तुम हो जिसको सोचा है मैंने ।।
-अतुल शुक्ला

#8 amo el cielo 

“soy una cometa , amo el cielo ..”
I am A Kite , I love Skies..
I am a kite , I love skies

beholded on your strings,

Have flattened my wings,

to cover my empire..

I dance on your wish,

to play mylove,

and to romance with westerlies,

I feel your jerks,

to raise myself high..

On the directions of your fingers

by sound of flickering eyes

Giving push to my side ends,

To endorse your desires..

Because …

I am Kite , I love my sky…
“porque..

soy una cometa , amo el ceilo…”

– Atul Shukla

#मैं ग़ालिब नहीं हूँ

 मैं ग़ालिब नहीं हूँ लेकिन

ग़ालिब ए ज़ुबान लिखता हूँ …

मैं सिर्फ़ बेहतर श्यारी ही नहीं 

फ़ैज़ ज़फ़र इक़बाल सी चाहत भी रखता हूँ !
– Atul Shukla
#KoriKalpana

#06 मेरे दो क़दम

मेरे बस दो क़दम

 

अगर मैं चलना चाहूँ 

आत्म निर्भर होकर

दो क़दम

तो क्या तुम चलने दोगे ?

 

मेरी आत्म त्रस्ना के पंखुड़ियो को

स्वतंत्रता के उड़ान भरने दोगे ?

 

अगर मैं एकला चलु

और अपनी कोशिकाओं में

अपने लक्ष्य की धार भरूँ

तो क्या मुझे गहरीं झूठी द्यायित्वता

के पिंजरो से मुक्त करके ..

मुझे अपने रचित लकीरों से लड़ने दोगे ?

 

अगर मैं चलना चाहूँ

निर्भीक आत्म केन्द्रित होकर 

स्वावलंबन के 

दो क़दम

तो क्या चलने दोगे ?

 

उठने दोगे क्या

मेरे शीश मेरे प्रयत्नो से 

तुम्हारे अहंकार के छितिज से उप्पर?

 

हिम सागर जैसा साहस लहरा कर

अपने रक्त बीज से कंचन पिघलाकर

क्या मुझे नए स्वरूप नव स्वप्नो में

सत्यता के रंग भरने दोगे ??

 

अगर मैं चलना चाहूँ

दो क़दम 

तो क्या मुझे चलने दोगे ?

 

बस पूछता हूँ तुमसे

एक प्रतंत्रता के प्रतिनिधी……..

 

मुझे क्या अपने 

रंग तरंग और सप्तरंग 

में स्वयं रंग चुनने का हक़ हैं ??

 

माँग बस इतना रहा हुँ 

इस जीवन में बस

मुझे मेरे दो क़दम !!!!!!!!!!
-अतुल शुक्ला

कानपुर
१२ अक्टूबर २०१६

#5 शून्य की सफलता

 शून्यता 

शून्य की सफलता पर आज दुःख होता हैं

रात के अंधकार में स्वयं शून्य प्रतीत होता हैं

शीतलता के अनलराग में कौन न्यून होकरसोता हैं ?

 

प्रकाश की सरलता में आज दुःख होता हैं

दिनकर की काया में साँच विलुप्तहोता हैं ..

 

जब ख़ुद में ख़ुद सिमटा मैं

असमां में भिखरते बादलों में मिलता हूँ,

तो धरा कीं गहराई को देख..

स्वयं के लालस्ता और व्यस्तता देख ,

आत्ममंथन की विफलता पर दुःख होता हैं  

 

मैं से स्वयं दोनो शब्दों में 

आत्म ह्रदय का ना होने से 

ना होने की सफलतासे दुःख होता हैं

 

आज आइने में ख़ुद को देख

भाव की क्रूरता और 

कालकी करुणता पर आश्चर्य होता हैं

 

शून्य की विफलता पर आज दुःख होता हैं

शून्य की क्रूर सफलता पर दुःख होता हैं ।

 

और काया की छाया में

फीकापन और कठोरता होना 

नियति की अनियमित्ता का धोखा होना..

 

अकेलेपन में अंधियारा मिलना

साथ होकर बिछड़ज़ाना परछाईं का

बतलाता हैं 

सीधे शब्दों में 

की ह्रदय की सरलता भी विफलता हैं

 

क्या सरल श्वेत दर्पण सा होना

कायरता को दिखलाता हैं ??

 

नहीं जानता हूँ कि ऐसा है कि नहीं …

अगर ऐसा भी तो भी अनजान हूँ ,

 

लेकिन …

 

आज बेजान सी मुस्कान में

अपनापन ना होना 

आत्म तिरस्कार का होना लगता है 

अकेले चलकर अंधकार में मिटना ही सही प्रतीत होता हैं

 

कटुता से टूट जाना

ह्रदय का रूठ जाना

शून्य कि सफलता से दुःख होता है 

 

स्वयं की शून्यता से दुःख होता है ….,
आज शून्य की विरलता पर दुःख होता है !

आज नियति की अधूरी परिक्रमा पर दुःख होता है !
– अतुल शुक्ला

१८ सितंबर २०१६
ख़ामोशी के दीवारों के बीच

#4 ना जाने कहाँ खोया रहता हूँ

#FromMyDairyPages

 ना जाने कहाँ खोया रहता हूँ

 

ना जाने कहाँ खोया रहता हूँ

कल्पनाओं में सोया रहता हूँ

 

छिपतीं धूप में 

असमां के साये में 

बहतीं नज़र के 

टूटें किनारों पर

अपनी चाह के

छोटे क़दमों से 

चल कर..

अद्रीक विहंगम पल पाता हूँ

 

ना जाने कहाँ खोया रहता हूँ
ना जाने कहाँ खोया रहता हूँ

ख़ामोशी की चादर ओंधे 

क्रतिम भीड़ में सोया रहता हूँ ….।

 

और परमाणु के कणकण में

मैं अपने काव्यरंग भरता हूँ 

 

कहता हूँ …

 

अलंघ्य ह्रदय तरंग तरंग से

मैं ख़ुद में सिमटा सागर हूँ…

मैं ख़ुद में किनारा हूँ ..

 

ना जाने कहाँ खोया रहता हूँ

ना जाने कहाँ खोया रहता हूँ…..
– अतुल शुक्ला

लगता हैं एक रात गयीं

लगता हैं एक रात गयीं

#3 लगता हैं एक रात गयीं
और एक सुबह ख़ुश्बू से रंगो का मिलना
मन की रूठी रूठी
बाग़ियों बाग़ियों में मुस्कान का खिलना
और फिर गुम होना हलचल का एकदम….

जैसे
लगता हैं
लगता है एक रात गयी

टूटीं बिखरीं हर बात गयीं
निखरी बदरी में मुस्कान बनी
खिलतीं कलियों कीं मुलाक़ात बनी
लगता हैं एक रात गयीं

भटकें पन्नों में एक और बार सही
अपर्ण क़दमों में झंकार वहीं
चिटकीं चिन्हों से जो आवाज़ बनी
लगता हैं इस बार कहीं

लिख कर ना सिमेटू
शब्दों के सँचार यहीं
बहने दूँ
हर राग यहीं

बसने दूँ एक और बार यहीं
हँसकर ख़ुदपर अपनी ख़ामोशी
कविताओं के आँचल में पलकर
ना बतलाऊँ

किसी को
लगता हैं एक रात गयीं
टूटीं भिख़री हरबात गयीं

लगता हैं बस हमें आज यूँही ……
लगता हैं एक रात गयीं
संजोने को एक बात रही

लगता हैं एक बात गयीं..

Atul Shukla,

3rd October 2016

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थोड़ा रुक लेते हैं..

#2 थोड़ा रुक लेते हैं

थोड़ा रुक लेते हैं..
थोड़ा रोक कर साँस ले लेते है
गुमशुम से आस्माँ से बात करलेते हैं
बिखरी बदरी से झाँक कर रूठे
सूरज कीं बात सुन लेते है
आज थोड़ा रुक लेते हैं….

बढ़ती घाटती आहों में
थोड़ा ठंडी सी धूप भर लेते है
आज थोड़ा रुक लेते है..
पानी के आइने से
अपने हाँथों की लकीरें धो लेते हैं…

आज थोड़ा रुक लेते है
अपनी कोशिश अपनी मंज़िले को
काग़ज़ में सिमेट लेते है ..
अपने ना ख़त्म होने वाली
तकलीफ़े को आँखों में बंद कर कर
आज रात दम भर कर सो लेते हैं
थोड़ा जीवन स्वप्न देख लेते है…

थोड़ी साथ रंग लेते है कल की
फ़िक्र भूलकर आज थोड़ा रुक लेते है….
ख़ुद से ख़ुद में हो लेते है

आज थोड़ा रूक लेते है ….

अतुलशुक्ला Taiwan Strait,

July 10th,2016

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