मेरीकोरीकल्पना

मेरीकोरीकल्पना

स्वेतपृष्ठोपरभिखेररहाहूँ..

इसपूर्णमासीकेनभतल

आत्मकणमनकुरेदरहाहूँ।

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पुर्णिमाकेशीतलप्रकाशमेंभींगकर

प्रेमरसकोतरसरहाहूँ …..

वेदनाओंकेचंचलप्रकोपमें

प्यासामैं

मनधनघनमनसेबरसरहाहूँ ..

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मेरीकोरीकल्पना

स्वेतपृष्ठोपरभिखेररहाहूँ

कल्पनाओंकेसागरतलबैठामै

अपनीकायाकोसीमेटरहाहूँ

स्वेतकाव्यलताओंमेंउलझी ….

घड़ियोंमेंस्वयंकोबिखेररहाहूँ ,

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सुनेगीईशक्यातेरी

क्या ? मेरीकोरीकल्पना ?

मेरीकोरीकल्पना

जिसेआजमैंस्वेतपृष्ठोपरभिखेररहाहूँ।

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अतुलशुक्ला

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I’ve been through endless struggles to become the person I am today and now there’s no point in expecting someone to understand me or my struggles

Existence

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Existence

I was never told this before -that the darkness prevails,
Darkness visible in the depth of our sights,
Like,
Two parallel light rays meets somewer in infinite,
With no equation and no theory of convergence and divergence.

The Darkness becomes darkness visible,
as it is,what its like.
It doesn’t needs any media to propagate, vaccum reason to imitate,
Bare theory here simply sustains.

Thereby at some sort of time,
The darkness becomes darkness visible.
All confusions,regrets and Questions resolves
and mystery of light simply falls.

When you understand this untold fact,
And the reason,
Why you were never told this before-  that darkness exists.
Darkness is visible in the depth of our sights,
Runs parallel but meets at infinite.

All forms of ostentation are unendurable,
when its inexplicable and played kinematics,
Darkness becomes darkness and more visible.

– AtulShukla

#Morning #Dark #twilight #infinite #strike #rhymsayers #seaside #vision #introspection

Are we the same as Trees?

Are we the same as Trees?

Our lives are as forest;
Each Individuals as trees
Showing cobwebs of branches,
Their leaves and some dry barks.

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Below the soils,
There is always chance to spread,
Spreading out are roots galore.
Branches to touch the sky
Turning up dry in that desire
Clouds, Sky & Star
Everything I saw, I dreamt is too far
With the time & the seasons
.

Wrinkled shadows turning dry

Never judge anyone,
By appearances alone,
You see not what we’ve atone.

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Hidden from our sight,
Is where our soul lurks
And somewhere God’s grace works.
And I ask you..
Are we same as Trees?

#Tree #SpeakingTree #journeytoself #forestfeatures #poetryporn #question

Ek Baat

कभी-कभी लगता है कि इंसान की सबसे बुनियादी जरूरत रोटी, कपड़ा या मकान नहीं बल्कि यह है कि उसकी कोई सुन ले या उससे कोई पूछ ले।

पानी का आयना

हर गम्भीर शब्दों से कविता गम्भीर नहीं होती , सरल काव्य रस से पिरोयी हुई भाव को छूती और वक़्त की खोयी हुई मेरी एक कविता

कविता संख्या : अनजान

“पानी का आयना”

दिन की दोपहरी में थक जाने पर
जब पीपल की छांव में
छिपने की सोची,
तो चमचमाता चिल्लाता कोई
जान लो सच अपना अपना मुझमें !
चमचोर चाँदनी सा ,
भू धरा में भिखरा हुआ ,
पानी का आयना ।

सब कुछ दिखता है ,
जितना भी टिकता है ।
बोलता हैं …
सब कुछ ;
पानी का आयना !
ना जात पात की अंध्यारी ,
ना भाव भ्रम की किलकारी ,
ना दाम धर्म की तौल यहाँ !
खुला बिकता हैं ,
यौवन सच का –
जितना भी सींचो
दिखता हैं तत्पर त्वरित ‘
सब कुछ एक पलभर
बस देखो तो सही
आगे बड़कर
ये वही है भू धारा में बिखरा पड़ा ,
पानी का आयना ।

अगर जानना है ख़ुद कि क़ीमत ,
तो देखलो पानी का आयना ।

पहचानना हैं
ख़ुद को ,
की कितना है ?
तो देखो कभी आगे बड़कर ,
पानी का आयना ।

~ अतुल शुक्ला

खुरदरा झूँठ

खुरदरा झूँठ,

झूठी महिमा,

झूठा सच,

झूठा तप,

झूठा पखांड का अवतार तेरा ,

सब कुछ झूठा इतना की –

अब टूटा ईश्वर पर विश्वास मेरा !

.

बिकाऊ इज़्ज़त ,

बिकाऊ आस्था ,

मन का दाम ,

बढ़ता रहा निरंतर ,

ईश्वर का व्यापार तेरा ,

अहंकार में लिपटी तेरी धोती

ईश्वर से ना डर कर

ख़ुद बन ईश्वर –

चलता रहा एक धागे का व्यापार तेरा !

.

खुरदरा झूँठ

झूठा वचन

झूँठ में लिपटा संसार तेरा

तू भ्रम पर जीवित

तू भ्रम में सीमित

बेचता रहा अभिमान तेरा !

.

जीवन की मूल्य लगाकर

बनाता गया ईमान तेरा

कैसा है तू लाल धारा का

जब झूठा है सब सम्मान तेरा !

खुरदरा है लाल नाम का धार तेरा !!

.

एक कविता धोकेबाज – झूँठे बाबाओं और उनके गुंडे गर्दी करने वाले जनेवधारी खड़ाऊँ वाले भक्तों के नाम !

एक साल

एक साल बदल गया

जीवन राग असफल गया ,

क़दमों के निचो से ज़मीं धसकी

जब असमां में सिमटा रवि

कण कण दरबदर – रंगबदर गया !

.

टूट गयी आशा ,

बढ़ी शब्दों में जो निराशा

रिश्तों का बोझ लिए,

आत्म रस और आत्म प्रेरणा का रेशम धागा

विश्वास में लिपटा टूट गया !

जब जीवन का एक साल रूठ गया !

.

प्रेम , धर्म , मर्यादाओं का झूठा जाल ,

अहाँकार और क्रूरता का क़दम टाल

झूठ और मक्करी की विविधता में

अपनो को रौंध गया ,

सपनो को अंतिम घाट के तट पर

धारा की रेती में सौंध गया !

सत्य का एक साल बोल गया !!

.

ना कुछ शेष ,

ना शिथिल अवशेष ,

ना कोई भाव सीमा

ना अब कोई परिवेश

एक साल बीत गया !

नियति का खेल बीत गया !

कटु मधुर संगीत गया !

.

काल के पुकार में

जीवन मैं अदना सीख गया !

जब जीवन से परे

सब रीत गया !

…………………..-अतुल

बहरूपियाँ

प्रांचि की छितिर साँच,

अरुण की भिखिर राख,

नीरद की अट्टहास !

तिमिर से श्वेत काँच ,

चमचमती परछाईं झाँक ,

दिनकर की अनुपस्थिति में कलानिधि

आज बन बैठा है बहरूपियाँ !

.

प्रकट हुई जो भादव राग ,

छूट गया पीछे माघ का फाग ,

बोयी हुई सनसनाहट की सुलगती ,

कोटि कटु शांति की आँच ;

कुंठित ह्रदय ठिठरन जैसे

सबरंग पसरी पूस की रात !

और झींगुर की तरह –

टिमिरता में शांति कण को निगलता ,

स्याह चादर में छिपकर व्यंग करता ,

अपने में से कोई बहरूपियाँ !

.

छुपकर चुपकर घुलमिलकर बहरूपियाँ ,

प्रभुवचनो में लिपटी मिश्री सा ,

चंदन अर्क की चादर ओढ़ें

प्रेम प्रतीति हरे मिले

सदा करता गुरु गुण गान

मनुष्य जीवन की सत्यता से भिन्न

कोई राह में भटका हुआ

बना हुआ स्व -अत्यधिक अभिमानी महान !

.

क्या ईश्वर भी कठपुतली सा दिखता है .,

जब गिनती में अग्रपाँति में समर्पित है

बहरूपियाँ !

बहरूपियाँ !

पतन

स्व: से स्वयं का पतन,

जब टूटा मेरा अपनो से मन ,

अहंकार और झूठे बदरा की परछाईं छूटी ,

जहाँ सिमटा था मेरा अपना वतन !

.

.

सोचकर , समझकर हैरान हूँ मैं ख़ुद में .

जब मैंने देखा है –

अपनो द्वारा किए गए जतन

कुंचित सीमित नभ कण कण में ,

जैसे शरद में संघर्षित रवि का तपन !

कैसे निरंतर कर्मों में शीर्ष क्रमिक ही है ईश्वर

जब स्व: से स्वयं का ही है पतन ?